भारतवासी

अब गर्व करें, शर्मिन्दा हों या सर पत्थर पर दे मारें ।

दुःख-दर्द लिए हैं देख रहे हम भारतवासी बेचारे ।

हम देख रहे क्या आज़ादी का मूल्य चुकाया है हमने ।

पैसे वाले दानव दल को भी श्रेष्ठ बनाया है हमने ।

हम देख रहे सर काट लिये जाते हैं कैसे सरहद पर ।

कैसे हमने एक कायर को है बना दिया अब अजर-अमर ।

हम मानव हैं पर मानव सा व्यवहार नहीं करते अक्सर ।

हम छीन-छपट कर धोखे से पा लेते औरों के अवसर ।

हम देश गान तो करते हैं पर देश ज्ञान से दूर खड़े ।

किसकी मजाल जो देशभक्त सा मुद्दे की कोई बात करे ।

हम उसको उत्तर या दक्षिण घोषित कर के बढ़ जाते हैं ।

जनता रोटी को तरसे पर हम नये शिखर चढ़ जाते हैं ।

हम प्रगतिशील हैं, प्रगति के ख़ातिर ही तो स्कूल गए ।

फिर धन अर्जन की शिक्षा ले नैतिक मूल्यों को भूल गए ।

ऐसी हालत है अपनी कि पशु क्या कीड़े भी दुत्कारें ।

ऐसे दुष्कर्मी हत्यारे हम भारतवासी बेचारे ।