औरतें

अर्घनग्न घूमकर शहर की धूल फाँकती ये औरतें ।

शक्ल से सभी के हाव भाव को हैं आँकती ये औरतें ।

ख़ुद हवस को पूज दूसरों को रोज़ झाँकती ये औरतें ।

काल सी कराल यूँ सभी को जैसे ताकती ये औरतें ।

क्रोध और भय स्वरूप हूँ पड़ा, बचूँ मैं इनसे किस तरह ।

कर रहा प्रयास इनसे दूर हीं रहूँ मैं चाहे जिस तरह ।

हाथ जोड़, पैर तोड़ भागता हूँ मैं यहाँ प्रत्येक दिन ।

वक्र हो चुकी है दृष्टि, घोर दुर्दशा है और हृदय मलिन ।

क्रोध से नहीं सुधर सकेगी दुर्दशा ये जानता हूँ मैं ।

पर इन्हीं को हर दशा की मूल मानता हूँ मैं ।

शासकों के शान की प्रतीक बन विराजती ये औरतें ।

और इनके साथ इनके पालतू हैं काटने को भागते ।

इनकी स्वार्थ सिद्धि हेतु रात भर ये आँख फाड़ जागते ।

इनके हेतु ये स्वयं के पालकों को बेझिझक हैं त्यागते ।

सृष्टि मेरी अन्य हैं जो द्वेषहीन और स्वार्थमुक्त हैं ।

कार्यरत हो भले परंतु जो प्रसन्नचित्त निरुक्त हैं ।